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2015 से 2026 तक… क्या यह सिर्फ संयोग है या बिहार में चली किसी लंबी राजनीतिक रणनीति की कहानी? पढ़िए खास रिपोर्ट !


न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क

पटना –  2015 के बिहार विधानसभा चुनाव को समझे बिना 2026 की बिहार राजनीति को पूरी तरह समझना मुश्किल है। उस चुनाव में महागठबंधन (RJD-JDU-कांग्रेस) ने भाजपा के नेतृत्व वाले NDA को बड़ी हार दी थी। चुनाव के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा आरक्षण नीति की समीक्षा संबंधी बयान को विपक्ष ने सामाजिक न्याय बनाम भाजपा के बड़े नैरेटिव में बदल दिया। इसका राजनीतिक असर इतना व्यापक हुआ कि चुनावी बहस विकास से हटकर आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर केंद्रित हो गई।

हाईलाइट्स –

  • 2015 बिहार चुनाव में आरक्षण समीक्षा बयान बना था बड़ा चुनावी मुद्दा।
  • NDA की हार के बाद भाजपा-संघ ने संगठन विस्तार पर विशेष फोकस किया।
  • मोहन भागवत के पटना दौरे ने राजनीतिक चर्चाओं को फिर गर्म किया।
  • संजय झा ने INDIA गठबंधन टूटने के लिए ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल को जिम्मेदार बताया।
  • नीतीश कुमार को INDIA का संयोजक नहीं बनने देने का दावा राजनीतिक बहस का नया केंद्र बना।
  • 2026 के चुनाव से पहले बिहार में पुराने राजनीतिक घटनाक्रम फिर चर्चा में हैं।

2015 की हार के बाद भाजपा-संघ की रणनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2015 की हार के बाद भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बिहार को विशेष राजनीतिक प्राथमिकता दी। संगठनात्मक विस्तार, बूथ स्तर तक नेटवर्क मजबूत करना, नए सामाजिक समूहों में पहुंच बनाना और सहयोगी दलों के साथ तालमेल बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा रहा। अगले वर्षों में भाजपा ने बिहार में अपना जनाधार बढ़ाया और अंततः राज्य की सत्ता संरचना में निर्णायक भूमिका हासिल की।

इसी संदर्भ में चिराग और भाजपा की निकटता को भी देखा जाता है। हालांकि इसके पीछे कई राजनीतिक और चुनावी कारण रहे हैं, इसलिए इसे केवल 2015 के घटनाक्रम से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा।

मोहन भागवत का पटना दौरा और राजनीतिक संदेश

आज मोहन भागवत का पटना दौरा और मुख्यमंत्री द्वारा उनका स्वागत केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा। बिहार चुनावी मोड में प्रवेश कर चुका है और ऐसे समय में संघ-भाजपा की सक्रियता को राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। यह संकेत है कि संगठन और सत्ता के बीच समन्वय पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रहा है।

INDIA गठबंधन पर संजय झा का बड़ा दावा

दूसरी ओर JDU के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा का बयान भी बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने दावा किया है कि 2024 लोकसभा चुनाव से पहले INDIA गठबंधन का संयोजक नीतीश कुमार  को बनाने के रास्ते में ममता बनर्जी और अरविंद केजरिवाल ने बाधा डाली।

यदि यह दावा सही माना जाए, तो इसका मतलब है कि INDIA गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर अविश्वास और प्रतिस्पर्धा शुरू से मौजूद थी। संजय झा का यह भी कहना है कि कांग्रेस सहमत थी, लेकिन बाद में मल्लिकार्जुन खरगे का नाम सामने आने से समीकरण बदल गए।

क्या INDIA गठबंधन अंदर से ही कमजोर था?

संजय झा का बयान दरअसल JDU की उस राजनीतिक लाइन को मजबूत करता है, जिसमें वह लगातार कहती रही है कि INDIA गठबंधन में नीतीश कुमार  को उचित सम्मान नहीं मिला। जेडीयू का तर्क है कि गठबंधन की आंतरिक राजनीति और नेतृत्व विवादों ने विपक्षी एकता को कमजोर किया, जिसके बाद नीतीश कुमार ने NDA में वापसी का फैसला किया।

हालांकि विपक्षी दलों की ओर से इस दावे को अलग नजरिए से देखा जा सकता है। उनका कहना हो सकता है कि गठबंधन टूटने के पीछे कई अन्य राजनीतिक कारण भी थे, केवल संयोजक पद का विवाद नहीं।

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