*एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक पहल: काशी में माधव कंदली रामायण कार्यक्रम की सफलता की कहानी*
ABKK Kamarupa 14th August 2026, Guwahati: द्वितीय राष्ट्रीय अयोध्या नंदन जन्मोत्सव-2026 की राष्ट्रीय विचार गोष्ठी (सेमिनार) उत्तर प्रदेश के काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के वैदिक विज्ञान केंद्र, वाराणसी में गुवाहाटी की ‘दक्षिण-पूर्व एशिया माधव कंदली रामायण मिलन सभा’ की पहल पर 25 जुलाई को सफलतापूर्वक आयोजित की गई। इस विचार गोष्ठी के आयोजन ने उत्तर भारत की प्रांतीय असमिया भाषा के 700 वर्ष पुराने अप्रमादी (सशक्त) कवि माधव कंदली द्वारा रचित ‘सप्तकांड रामायण’ को भारत के ऐतिहासिक विश्वविद्यालय के प्रांगण में प्रतिष्ठित किया। इस कदम ने साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में भारतीय उपमहाद्वीप की रामायण के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर स्थापित किया। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आयोजन ने असम की सांस्कृतिक परंपरा और पवित्र काशी शहर के बीच एक मानवीय सांस्कृतिक सेतु का निर्माण किया, जिसने भारत की साझी सभ्यतागत विरासत के माध्यम से राष्ट्रीय अखंडता के आदर्शों को सुदृढ़ किया।
भारतीय कवि माधव कंदली रामायण के राष्ट्रीय अभियान कार्यक्रम के राष्ट्रीय प्रचारक एवं आयोजक, गुवाहाटी के खारघुली निवासी राजीव हरि कौशिक की समग्र योजना और अनुसंधान के आधार पर यह राष्ट्रीय स्तरीय कार्यक्रम कार्यान्वित किया गया। माधव कंदलीकृत रामायण के माध्यम से रामायणी साहित्य, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक योगदानों को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पटल पर प्रस्तुत करने के साथ-साथ, असम और भारत के अन्य राज्यों की प्रांतीय भाषाओं की रामायण के बीच सांस्कृतिक व शैक्षणिक भ्रातृत्व भाव जगाने पर ध्यान केंद्रित किया गया। वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) निर्माता राजीव हरि कौशिक ने राष्ट्रीय एकता के इस प्रयास को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त शैक्षणिक और सांस्कृतिक मंच में बदल दिया।
असम के रामायणी साहित्य को भारतवासियों के बीच लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से द्वितीय राष्ट्रीय अयोध्या नंदन जन्मोत्सव-2026 की तीसरी राष्ट्रीय विचार गोष्ठी “सीता सिंदूर” शीर्षक से आयोजित व्याख्यान में असम की चार प्रमुख हस्तियों को आमंत्रित किया गया। आमंत्रित वक्ताओं में गुवाहाटी स्थित असम कौशल विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक प्रो. डॉ. भवरंजन शर्मा; गुवाहाटी के गीतानगर कॉलेज के इतिहास विभाग के सहायक प्रोफेसर श्री गुप्तजीत पाठक; धेमाजी जिले के सिलापाथर से गणेश प्रसाद उपाध्याय; और सिलचर की विशिष्ट रामायण शोधकर्ता व अनुवादक डॉ. देवयानी भट्टाचार्य शामिल थे। उनकी भागीदारी ने राष्ट्रीय संवाद में असमिया रामायण अध्ययन के बढ़ते शैक्षणिक महत्व को दर्शाया।
इस कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथियों द्वारा दूसरी पुस्तक का भी विमोचन किया गया। पुस्तक के लेखक गुप्तजीत पाठक हैं और इसका शीर्षक ‘Reimagining the Manifestations of Bharatiya Knowledge Systems: Holistic History, Culture and Identity’ है। इस पुस्तक का प्रकाशन इंडू बुक सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली द्वारा किया गया है। इस अवसर पर गुप्तजीत पाठक ने ‘Srimanta Sankaradeva’s Ramayanic Literature and the Ramayana Traditions of India and Southeast Asia: A Comparative Historical Study’ विषय पर एक शोध व्याख्यान प्रस्तुत किया, जिसमें श्रीमंत शंकरदेव के रामायण-आधारित साहित्य और भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया की रामायण परंपराओं का तुलनात्मक ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया।
इस आयोजन में असम और वाराणसी सहित विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों, शोधकर्ताओं, रामायण प्रेमियों तथा उत्तर-पूर्व एवं असम के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रों ने भाग लिया। इस प्रकार के कार्यक्रमों ने भारतीय संस्कृति, रामायण परंपरा और विभिन्न राज्यों के बीच सांस्कृतिक समन्वय को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस व्यापक भागीदारी ने विचार गोष्ठी को अंतर-क्षेत्रीय विद्वत संवाद के एक महत्वपूर्ण मंच में बदल दिया।
कार्यक्रम में राजीव हरि कौशिक द्वारा संपादित स्मारिका-पुस्तक “आई सीता गोसानी” का विमोचन किया गया, जिसे विद्वानों और प्रतिभागियों से व्यापक प्रशंसा मिली। समकालीन शैक्षणिक और सांस्कृतिक विमर्श में असमिया रामायण साहित्य की निरंतर प्रासंगिकता को दर्शाते हुए अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति में इसे जारी किया गया। चर्चा में भारत की विविध रामायण परंपराओं की रक्षा के महत्व पर बल दिया गया और क्षेत्रीय साहित्य व संस्कृति के विकास में माधव कंदली के अनूठे योगदान पर प्रकाश डाला गया।
उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित बड़ागांव के श्री चतुर्भुजी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री महंत अवधूत गिरी जी महाराज ने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। अध्यक्षता काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. डॉ. शंकर कुमार मिश्र (राष्ट्रीय प्रभारी, विश्व सनातन संस्थान) ने की।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वैदिक विज्ञान केंद्र के समन्वयक प्रो. डॉ. विनय कुमार पांडे ने सम्मानित अतिथि के रूप में अपने संबोधन में कहा कि गोस्वामी तुलसीदास की रामायण की तरह ही 14वीं शताब्दी के माधव कंदलीकृत रामायण का संदेश भी दूर-दूर तक फैलना चाहिए।
कार्यक्रम में प्रो. डॉ. भवरंजन शर्मा और विषय विशेषज्ञ वक्ता के रूप में गणेश प्रसाद उपाध्याय ने विचार व्यक्त किए। पर्यावरण विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए असम सरकार के नागरिक सम्मान “असम गौरव” से सम्मानित तथा वर्ष 2024 में ‘विज्ञान युवा शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार’ प्राप्त, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. पूरबी सैकिया ने सम्मानित अतिथि के रूप में माधव कंदली रामायण पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। श्री गुप्तजीत पाठक और डॉ. देवयानी भट्टाचार्य ने असम के रामायण साहित्य के साहित्यिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक आयामों पर व्यावहारिक व्याख्यान दिए। उनकी प्रस्तुतियों ने यह प्रदर्शित किया कि क्षेत्रीय रामायण परंपराएं भारतीय सभ्यता की व्यापक समझ में किस प्रकार योगदान देती हैं।
यह भव्य कार्यक्रम गुवाहाटी के ‘लुइत-जिस्ट कम्युनिकेशन एजुकेशनल ट्रस्ट’ और वाराणसी के ‘विश्व सनातन संस्थान’ के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। विश्व सनातन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संतोष आचार्य ने कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापित किया। लुइत-जिस्ट कम्युनिकेशन एजुकेशनल ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी एवं द्वितीय राष्ट्रीय अयोध्या नंदन जन्मोत्सव 2026 के काशी सम्मेलन आयोजन समिति के महासचिव राजीव हरि कौशिक के नेतृत्व में समन्वय स्थापित किया गया, जबकि आयोजन समिति के मुख्य सहायक सचिव दीपांकर बड़ा ने स्वागत व्यवस्था का दायित्व संभाला। कार्यक्रम का संचालन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की स्नातकोत्तर छात्रा समीक्षा मिश्र ने किया।
माधव कंदली रामायण पर आधारित इस सम्मेलन की सफलता की चर्चा अन्य राज्यों में भी फैल गई। दैनिक हिंदी समाचार पत्रों सहित राष्ट्रीय मीडिया में इसे व्यापक कवरेज मिला। प्रकाशित समाचारों में ‘दक्षिण-पूर्व एशिया माधव कंदली रामायण मिलन सभा’ के भविष्य के आयोजनों, “आई सीता गोसानी” के विमोचन और रामायण परंपरा पर विद्वानों के विचारों को प्रमुखता से रेखांकित किया गया। मीडिया की इस स्वीकृति ने भारतीय साहित्यिक इतिहास में असम के योगदान के प्रति जन-जागरूकता को काफी बढ़ाया है।
इस आयोजन ने यह साबित कर दिया कि भारतीय कवि माधव कंदली की विरासत अब केवल असम तक सीमित नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे भारत की राष्ट्रीय सांस्कृतिक चर्चा का हिस्सा बन रही है। विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों, संतों, शोधकर्ताओं और छात्रों को एक साथ लाकर इस पहल ने शैक्षणिक सहयोग को मजबूत किया, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया और एक एकजुट सभ्यतागत ग्रंथ के रूप में रामायण की स्थायी प्रासंगिकता को पुनर्गठित किया।
इस पहल की उल्लेखनीय सफलता राजीव हरि कौशिक की दूरदर्शिता, समर्पण और संगठनात्मक नेतृत्व का प्रमाण है। माधव कंदली रामायण के राष्ट्रीय अभियान के प्रचारक और आयोजक के रूप में कौशिक के निरंतर प्रयासों ने असम के राम-संस्कृति आंदोलन को अनुसंधान, चर्चा और सांस्कृतिक एकीकरण के एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच में बदल दिया है। काशी कार्यक्रम ने न केवल माधव कंदली की साहित्यिक प्रतिभा का उत्सव मनाया, बल्कि रामायण की साझी विरासत के माध्यम से भारत की ‘विविधता में एकता’ के शाश्वत संदेश को भी सुदृढ़ किया। इसने भविष्य के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए एक मजबूत नींव रखी है जो असम की रामायण परंपरा की अमूल्य विरासत को संरक्षित, प्रसारित और प्रचारित करना जारी रखेगी।

